अन्‍यर्थ-The Other Meaning

आर्थिक दुनिया में दैनिक सत्‍यों के दिलचस्‍प अन्‍यर्थ

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Anshuman Tiwari


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पर्दा है… पारदर्शिता का !!!!

Posted On: 3 Jun, 2010  
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मां का लाडला बिगड़ गया !!

Posted On: 1 May, 2010  
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आम जैसा आदमी

Posted On: 24 Mar, 2010  
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मुक्त बाजार के बंधुआ

Posted On: 20 Jan, 2010  
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Hello world!

Posted On: 5 Jan, 2010  
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अभाव से या स्वभाव से ?

Posted On: 5 Jan, 2010  
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के द्वारा: Agastee Agastee

भाई बाजार की माया से बचना तो मुश्किल है। हजार हजार मुखौटों में बाजार घर की देहरी और कहें तो सोने के कमरे में भी खड़ा है। कबीर के जमाने का बाजार जरूरतों का बाजार था जहां कोई जाता था तो सिर्फ जरूरत के सामान के लिए। आज का बाजार तो लालच का बाजार है जो मुनाफे की जगह तलाशता हुआ खुद घर के अंदरूनी हिस्‍से में निहायत निजी हिस्‍सों में घुसा चला आता है। आज के बाजार में बहस मुश्किल है। कबीर के बाजार में तो दर्शन से लेकर सियासत पर बहस मुमकिन थी। बाजार की बहस सुल्‍तान और बादशाह के दरबार में भी गूंज जाती थी आज के बाजार में इस तरह की बहस नक्‍कारखाने में तूती की आवाज बनकर खत्‍म हो जाती है। मुक्ति सपना है मुक्‍त बाजार में। इसका टूटना ही हमारी मुक्ति है। यह अपनी होड़ और मुनाफा लिप्‍सा से ही टूटेगा। उसी तरह जैसे बड़ी मछलियां छोटी मछलियों को खा जाती है। बाजार में खड़े हमारा मोल लगा रहे कारोबारियें ऐसी ही लड़ाई में खत्‍म होंगे। हालांकि यह हाइपोथीसिस है। कोई कह सकता है मैं अतिरिक्‍त आशावादी हूं मगर क्‍या करूं। आशा करूं तभी तो जिंदा रहूं। जिंदगी की यही एक शर्त है। बाकी तो उसी तरह है कि रात को नींद नहीं आती। कबीर की तरह सुखिया सब संसार है खावे अरू सोवे, दुखिया दास कबीर है जागे अरू सोवे। अच्‍छा लिखा है आपने आपको साधुवाद और बधाई।

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